कैसे हुआ माॅ काली की स्थापना पूरी जानकारी के साथ श्रद्धा और आस्था के केंद्र बना - माॅ काली मंदिर... देखिए खास खबर - CG RIGHT TIMES

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Wednesday, March 30, 2022

कैसे हुआ माॅ काली की स्थापना पूरी जानकारी के साथ श्रद्धा और आस्था के केंद्र बना - माॅ काली मंदिर... देखिए खास खबर

 सीजी राइट टाइम्स न्यूज चैनल की खास रिपोर्ट



नवरात्र में लगातार हो रहे है श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा 


मुंगेली // सन् 1945 के पहले सभी कुम्भकार जनता मार्केट गोल बाजार ओंसवाल भवन गली के अंदर रहते थे। सन् 1945 के बाद सभी कुम्भकार जनता मार्केट गोल बाजार को छोड़कर खर्रीपारा आ गया। 1945 के पहले जनता मार्केट गोल बाजार ओंसवाल के पास माॅ की मड़िया था। सभी कुम्भकार द्वारा माॅ की मड़िया का पूजा पाठ भी किया करता था। 1945 के बाद सभी कुम्भकार चले जाने के बाद माॅ के कोई सेवक नहीं था तथा कुछ महिने बीत जाने के बाद वहां कचरे के ढेर लग गया और माॅ कचरे के अंदर हो गया। 

कुछ साल बीत जाने के बाद माॅ का सपना पंचराम कुम्भकार के पिता स्व. सरहा राम कुम्भकार को सपना आना शुरू हो गया। सपने में उसे बार-बार कहती थी कि मैं कचरे के ढेर में पड़ी हॅू, मुझे यहां से लेकर चलो, पहले से किसी ने ध्यान तक नहीं दिया। कुछ दिन बाद फिर सपना आता है और माॅ फिर कहती है मुझे यहां से ले चलो, मुझे यहां से ले चलो, तब यहां सब कुछ बुर्जर्गो से विचार किया गया। विचार में किसी भी प्रकार के हल नहीं निकला तथा समय निकलते चला गया। कुछ दिन बीत जाने के बाद चैत्र नवरात्र आता है। चैत्र नवरात्र होने के बाद घरो मे जोत-जवारा बोया जाता था। इस दौरान फिर माॅ की सपना आना शुरू हो गया। सरहा राम के घर में जवारा बोते थे और माता की सेवा भजन भी करते थे, इनमें देवी-देवता भी चढ़ता था। इसमें जय मां काली, जय मां काली, जय मां काली लाना है, मैया को लाना है, यही रट लगा रहता था। दो चार जनों देवी चढ़ा तो उन सबने भी जय मां काली, जय मां काली, रट लगाना शुरू कर दिया। फिर इस संबंध में बुजुर्गो ने ध्यान किया कि नहीं अब माॅ को लाना है और बुजुर्गो ने महाराज से संपर्क किया इसके बारे में पूरी विस्तार से चर्चा किया गया तथा सबकी सहमति से माॅ काली से प्रार्थना किया गया कि हम आपकी सेवा पूजा पाठ नहीं जानते मैया आप हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो जो हम आप को लेने के लिए आ रहे हैं बाजा बाजा के साथ पूजा पाठ के सामान लेकर ओंसवाल भवन के पास पहुॅचे। वहां जाकर मां का पूजा किया गया और कहा कि हे माॅ हम आपको लेने आए हैं तो हमारे साथ चलने को तैयार हो, जब उठाने की कोशिश किया तो उठा नहीं। कोशिश करने के बाद फिर मां से प्रार्थना किया है मां हम आप लोगों को लेने आए हैं आप हमारे साथ चलो मां जयकारा लगाकर उठा तो उठ गया फिर एक माॅ की मडिया रखकर सब गाजे-बाजे के साथ खर्रीपारा लेकर आए। यह सब सन् 1965-1966 के करीब माॅ की मडिया को स्थापित कर किया। इसी तरह धीरे-धीरे माॅ के प्रति आस्था बढ़ते गए और एक से बढ़कर एक दान-दाता भी तैयार होता गया। फिर माॅ की एक सुंदर सी मंदिर भी बनया गया। जिसे खर्रीपारा स्थित काली माई वार्ड , काली मंदिर के नाम से पुरे जिले में प्रसिद्ध मंदिर है। चैत्र एवं कुवार नवरात्र में जोत-जवारा भी बोया जाता है तथा नवरात्र में भागवत कथा का आयोजन होता है। माॅ के प्रति लगातार श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा हो रही है। दीपावाली की रात्रि 12 माॅ काली की भव्य पूजा आरती भी होती है और प्रसाद वितरण भी किया जाता है।  


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